आओ आज फिर इस शहर मैं .. कुछ अपने मन की सुनाने , कुछ अपने मन की कहने कुछ मेरी सुनने के बहाने .. कुछ पुराणी रीत निभाने .. कुछ बचे धागे पिरोने ... जिन्हें आधे मैं छोड़ चले थे .. कभी डी एस बी की सीढियों पर .. तो कुछ मॉल रोड पर ताल किनारे .. लौटो तो तुम बस किसी बहाने .
naya varsh ,naya blog , purane kisse aur purani lekhni ke sath is nayi shuruwaat ka swagat hai.
ReplyDeletekabhi hamare blog pe padhare
ReplyDeleteenomem.blogspot.com
आओ आज फिर इस शहर मैं ..
ReplyDeleteकुछ अपने मन की सुनाने ,
कुछ अपने मन की कहने
कुछ मेरी सुनने के बहाने ..
कुछ पुराणी रीत निभाने ..
कुछ बचे धागे पिरोने ...
जिन्हें आधे मैं छोड़ चले थे ..
कभी डी एस बी की सीढियों पर ..
तो कुछ मॉल रोड पर ताल किनारे ..
लौटो तो तुम बस किसी बहाने .
अधिक नहीं ,वे अधिकतर की बात करते हैं
ReplyDeleteनदी को छोड़ समंदर की बात करते हैं
हमारे दौर में इन्सान का अकाल रहा
ये लोग फिर भी पयम्बर की बात करते हैं
जिन्हें भरोसा नहीं है स्वयं की मेहनत पर
वे रोज़ ही किसी मन्तर की बात करते हैं
नहीं है नींव के पत्थर का जिक्र इनके यहाँ
ये बेशकीमती पत्थर की बात करते हैं
ये अफसरी भी मनोरोग बन गई आखिर
वो अपने घर में भी दफ्तर की बात करते हैं
मैं कैसे मान लूँ —वो लोग हो गये हैं निडर
जो बार —बार किसी डर की बात करते हैं
वो अपने आगे किसी और को नहीं गिनते
वो सिर्फ अपने ही शायर की बात करते हैं.