Monday, January 11, 2010

कैसे कैसे लोग हमारे जी को जलने आ जाते हैं,
अपने अपने ग़म के फ़साने हमें सुनाने आ जाते हैं.

4 comments:

  1. naya varsh ,naya blog , purane kisse aur purani lekhni ke sath is nayi shuruwaat ka swagat hai.

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  2. kabhi hamare blog pe padhare

    enomem.blogspot.com

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  3. आओ आज फिर इस शहर मैं ..
    कुछ अपने मन की सुनाने ,
    कुछ अपने मन की कहने
    कुछ मेरी सुनने के बहाने ..
    कुछ पुराणी रीत निभाने ..
    कुछ बचे धागे पिरोने ...
    जिन्हें आधे मैं छोड़ चले थे ..
    कभी डी एस बी की सीढियों पर ..
    तो कुछ मॉल रोड पर ताल किनारे ..
    लौटो तो तुम बस किसी बहाने .

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  4. अधिक नहीं ,वे अधिकतर की बात करते हैं
    नदी को छोड़ समंदर की बात करते हैं

    हमारे दौर में इन्सान का अकाल रहा
    ये लोग फिर भी पयम्बर की बात करते हैं

    जिन्हें भरोसा नहीं है स्वयं की मेहनत पर
    वे रोज़ ही किसी मन्तर की बात करते हैं

    नहीं है नींव के पत्थर का जिक्र इनके यहाँ
    ये बेशकीमती पत्थर की बात करते हैं

    ये अफसरी भी मनोरोग बन गई आखिर
    वो अपने घर में भी दफ्तर की बात करते हैं

    मैं कैसे मान लूँ —वो लोग हो गये हैं निडर
    जो बार —बार किसी डर की बात करते हैं

    वो अपने आगे किसी और को नहीं गिनते
    वो सिर्फ अपने ही शायर की बात करते हैं.

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